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कुछ फरिस्ते आ रहे हैं

अश्क अपने पी रहे हैं तिरगी' को खा रहे है-मतला
आदमी के भेष धर के कुछ फरिश्ते आ रहे है-१
चैन इनको हैं कहाँ पर ये कहाँ सो पा रहे है-२
बिन किए परवाह अपनी मौत से टकरा रहे हैं-३
धर्म अपना ये बखूबी हर कदम, हि निभा रहे है-४

छोड़ कर घर-बार अपना सब की' कर सेवा रहे हैं -५
चारा'गर औ वर्दी' वाले जख्म सर पे खा रहे हैं-६
कुछ दरिंदे मौका, पा कर आग सी भड़का रहे है-७
दीन की तालीम वाले मौत लो बटवा रहे हैं-८
खो गई इनकी हया तक ढाल बन जो दिखा रहे हैं-९
कलमकार-सावन चौहान कारोली
https://www.writersindia.in/2019/06/blog-post_23.html?m=1
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Covid-19

This Gazal concern to covid-19



मौत के खोफ से, हैरान हुआ जाता है आज लाचार सा, इंसान हुआ जाता है -मतला
चार पैसे क्या कमाए की, अकड़ थी भारी आज चौबारा भी, दालान हुआ आता है-१
नाज इसको था बहुत, अपने अविष्कारों पर  आज मजबूर, ले विज्ञान हुआ जाता है-२
चाँद का खाब था, धरती थी ये थोड़ी यारों शह्र दर शह्र, ले मैदान हुआ जाता है-३
होड़ हथियार की, क्या क्या न बनाया "सावन" अब धराशाही ले, अभिमान हुआ जाता है-४
आंख दुनियाँ को दिखाता था बड़ा दादा था  आज दादा वो परेशान हुआ जाता है-५
वो जो कहते थे, कि पिछड़ा सा वतन है भारत उनकी बिगड़ी तो, ये हनुमान हुआ जाता है-६
है नजर धूर्त की, दुनियाँ के कारोबारों पर चीन दाना ये, बेईमान हुआ जाता है-७
जीव छोड़ा न कोई इसने, जिसे खाया ना आदमी था कभी, शैतान हुआ जाता है-८
छेड़खानी है गलत दोस्त मेरे, कुदरत से सब तमाशे का सा, सामान हुआ जाता है-९
कलमकार -सावन चौहान कारोली  15,16-04-2020
https://www.writersindia.in/2019/07/blog-post.html?m=1

Pulwama attack -the pratikar

Pulwama attack -the pratikar

भारतीय इतिहास का काला दिन पुलवामा अटैक जो भूले से नहीं भुलाया जा सकता उस समय कवि के हृदय में उठते आक्रोश को दर्शाता हुआ एक मार्मिक चित्रण जो आपके सामने हरियाणवी रंग में एक रागनी के रूप में आपके समक्ष प्रस्तुत है:-https://www.writersindia.in/2019/08/Ichchha-shakti.html?m=1

सपने में भी डरया करे तने "तांडव" ईसा दिखा दयांगे हम महाकाल के लाल तने तेरी नानी याद दिला दयांगे
"पुलवामा" में धोखे त, तने "आतंकी" प्रहार करया सहनशीलता देखी थी इब हद का डोला पार करया भारत माँ के शेरां पे तने कपटी छुप के वार करया के होगा अंजाम तने नहीं पापी कतीई विचार करया भोले की सूँ आज तने तेरे घर में घुसकै गाह दयांगे हम महाकाल के लाल… 
के जाण्या तु तेरी घात का, होवेगा "प्रतिकार" नहीं सिंहसन पे "सिंह" बिराज्या, लोम्बड और सियार नहीं आन बान म्हारी शान स् "फौजी" केवल पहरेदार नही इतनी लाश बिछा दयांगे, कई दिन तक मिले करार नहीं तने सूते शिवगण मारे स्, तेरा नाम निशान मिटा दयांगे हम महाकाल के लाल… 
एक सूरमा अभिनंदन तेरी छाती जा लालकारया…

Bhookamp the earthquake

Bhookamp the earthquake


कांपी धरती  डोला पर्वत  चहुँओर उठा एक कोलाहल
मचा हाहाकार, चीखो-पुकार  थर-थर करके ढह गए महल
गये उजड़ नगर सब गया ठहर एक प्रलय गई सब पल में निगल
सागर धुजा पक्षी कूके  हुई ऐसी अचानक उथल-पुथल
 कोई सोया था कोई जागा था  कोई जान बचाने भगा था 
कितने ही पड़े थे लहूलुहान  कितनो की न जाने जान गई
कितने ही जीवित दफ़न हुए  शायद सटीक अनुमान नहीं
नेपाल पड़ा था लहूलुहान  बेबस बेसुध सा बेचारा
जैसे ही ख़बर मिली सबको  था मदद को दौड़ा जग सारा

सावन चौहान करौली

https://www.writersindia.in/2019/06/blog-post_23.html?m=1

मेरे हुजरे में कभी आओ
अदब का चाँद रखता हूँ

होशलों की दीवारें
और छान रखता हूँ

सेज मखमल की मुनासिब न हो शायद
टूटी खटिया है मगर सम्मान रखता हूँ

हक किसी मजलूम का खाता नहीं मैं
चटनी रोटी में मगर ईमान रखता हूँ

न मिले पकवान शायद महलों से....

Sawan

Mere jiwan ka kona

मेरे जीवन का कोना

इस कोने में भाव भतेरे इस कोने में छुपे सवेरे
इस कोने में चाँद औ सूरज इस कोने के हँसी नजारे
इस कोने में बैठ भवानी बुनती है नित नई कहानी
ये कोना उदगार तोलता ये कोना हृदय द्वार खोलता
इस कोने में सपने सजते इस कोने में मौन बोलता
ये कोना एक चित्र उकेरे इस कोने में रंग घनेरे
ये कोना जादू की गठरी इस कोने की बातें वखरी
इस कोने में ठाव कई हैं सफर बहुत ठहराव कई हैं
ये कोना सुख दुःख है समेटे ये कोना हर विदना मेटे
इस कोने में बहती नदियाँ इस कोने में चलती नोका
इस कोने में ज्वार उमड़ता इस कोने में अमृत झड़ता
इस कोने में गिरते झरने इस कोने से निकले किरणें
ये कोना है मीत हमारा इस कोने सा कौन है प्यारा
Writer-sawan chauhan karoli       Date- २३ October 2019 https://www.writersindia.in/2019/06/blog-post_23.html?m=1

Meri Lekhni kalam

लेखनीकलम
प्रचंड तेज सूरज सा इसमें । कलम उगलती है शोले ।। दिल की पीर शब्द बन जाती । फिर जो काव्य रंग घोले ।।
फूलों सी नाजुक भी है ये । तेज कलम शमसीरों से ।। अंगारे भी लिखती है ये । अनमोल शब्द भी हीरों से ।।
उठे क्रान्ति जब चलती है । इंकलाब का नाद उठे ।। जब जब चले, जले दीपक सी । अन्धकार का नाम मिठे ।।
कड़वी मीठी दोनों जाने । नहीं डरे सच कहने से ।। कही शस्त्र बनती तनती है । कही ये सजती गहनों से ।।
दर्द लिखे ये जख्मी दिल का । आँखों की लिखती भाषा ।। कभी लिखे तन्हाई मन की । कभी लिखे ये अभिलाषा ।।
कभी प्रेम रस कभी वीर रस । विरह लिखे ये विरहन की।। देश प्रेम जब जब लिखती है। छाती कांपे दुश्मन की ।।
लू लिखे ये जेष्ठ मॉस की । लिखे फुवारे सावन की ।। ठिठुरन लिखती है सर्दी की। लिखे बहारें योवन की ।।
गीत फ़ाग के प्यारे लिखती। और बौछारें रंगों की ।। लिखे वीरता रणवीरों की ।