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Showing posts from April, 2020

कुछ फरिस्ते आ रहे हैं

अश्क अपने पी रहे हैं तिरगी' को खा रहे है-मतला
आदमी के भेष धर के कुछ फरिश्ते आ रहे है-१
चैन इनको हैं कहाँ पर ये कहाँ सो पा रहे है-२
बिन किए परवाह अपनी मौत से टकरा रहे हैं-३
धर्म अपना ये बखूबी हर कदम, हि निभा रहे है-४

छोड़ कर घर-बार अपना सब की' कर सेवा रहे हैं -५
चारा'गर औ वर्दी' वाले जख्म सर पे खा रहे हैं-६
कुछ दरिंदे मौका, पा कर आग सी भड़का रहे है-७
दीन की तालीम वाले मौत लो बटवा रहे हैं-८
खो गई इनकी हया तक ढाल बन जो दिखा रहे हैं-९
कलमकार-सावन चौहान कारोली
https://www.writersindia.in/2019/06/blog-post_23.html?m=1

Covid-19

This Gazal concern to covid-19



मौत के खोफ से, हैरान हुआ जाता है आज लाचार सा, इंसान हुआ जाता है -मतला
चार पैसे क्या कमाए की, अकड़ थी भारी आज चौबारा भी, दालान हुआ आता है-१
नाज इसको था बहुत, अपने अविष्कारों पर  आज मजबूर, ले विज्ञान हुआ जाता है-२
चाँद का खाब था, धरती थी ये थोड़ी यारों शह्र दर शह्र, ले मैदान हुआ जाता है-३
होड़ हथियार की, क्या क्या न बनाया "सावन" अब धराशाही ले, अभिमान हुआ जाता है-४
आंख दुनियाँ को दिखाता था बड़ा दादा था  आज दादा वो परेशान हुआ जाता है-५
वो जो कहते थे, कि पिछड़ा सा वतन है भारत उनकी बिगड़ी तो, ये हनुमान हुआ जाता है-६
है नजर धूर्त की, दुनियाँ के कारोबारों पर चीन दाना ये, बेईमान हुआ जाता है-७
जीव छोड़ा न कोई इसने, जिसे खाया ना आदमी था कभी, शैतान हुआ जाता है-८
छेड़खानी है गलत दोस्त मेरे, कुदरत से सब तमाशे का सा, सामान हुआ जाता है-९
कलमकार -सावन चौहान कारोली  15,16-04-2020
https://www.writersindia.in/2019/07/blog-post.html?m=1