Friday, August 23, 2019

Meri Lekhni kalam





लेखनी कलम

प्रचंड तेज सूरज सा इसमें ।
कलम उगलती है शोले ।।
दिल की पीर शब्द बन जाती ।
फिर जो काव्य रंग घोले ।।

फूलों सी नाजुक भी है ये ।
तेज कलम शमसीरों से ।।
अंगारे भी लिखती है ये ।
अनमोल शब्द भी हीरों से ।।

उठे क्रान्ति जब चलती है ।
इंकलाब का नाद उठे ।।
जब जब चले, जले दीपक सी ।
अन्धकार का नाम मिठे ।।

कड़वी मीठी दोनों जाने ।
नहीं डरे सच कहने से ।।
कही शस्त्र बनती तनती है ।
कही ये सजती गहनों से ।।

दर्द लिखे ये जख्मी दिल का ।
आँखों की लिखती भाषा ।।
कभी लिखे तन्हाई मन की ।
कभी लिखे ये अभिलाषा ।।

कभी प्रेम रस कभी वीर रस ।
विरह लिखे ये विरहन की।।
देश प्रेम जब जब लिखती है।
छाती कांपे दुश्मन की ।।

लू लिखे ये जेष्ठ मॉस की ।
लिखे फुवारे सावन की ।।
ठिठुरन लिखती है सर्दी की।
लिखे बहारें योवन की ।।

गीत फ़ाग के प्यारे लिखती।
और बौछारें रंगों की ।।
लिखे वीरता रणवीरों की ।
गाथा लिखती जंगों की ।।

फूल कभी खुशबू लिखती है ।
कभी खार तलवार लिखे ।।
जीत प्रशंसा लिखे अनोखी।
कभी कसकती हार लिखे।।

मेरी लेखनी दीवानी है ।
कुदरत का शृंगार लिखे ।।
तितली भंवरा कोयल दादुर।
मिलन की रुत और प्यार लिखे।।

सावन चौहन कारौली -एक नादान कलमकार...✍

Wednesday, August 14, 2019

आगे-आगे लेखनी



आगे आगे लेखनी मैं चला पीछे पीछे-2

लेखनी
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आगे आगे लेखनी मैं चला पीछे पीछे-2
थे कितने निराले जो चित्र इसने खिचे ।।
आगे लेखनी.....

पर्वत पे झुकती घटा काली काली देखी
सिली सिली बरखा की बूंदे रसवाली देखी ।
मिटटी की सोंधी सोंधी खुशबू निराली देखी,
मल्हार गाती एक कोयलया काली देखी ।।
वो झूले पे 'गोरी झूले'अम्बुवा के नीचे ।
आगे आगे लेखनी...

विरहा की पीड़ा और विरहन तड़पती देखी,
देखी मैंने पत्तों पे शबनम सुलगती देखी ।
फूलों से भंवरों के अधर मैंने जलते देखे,
पर्वत को हिलते देखा शिलाएँ पिंघलती देखी ।।
बेनूर देखे भरी रुत में बगीचे ।
आगे आगे लेखनी...

रुसवाई देखी और प्यार भी देखा मैंने,
दगेबाज होता दिलदार  भी देखा मैंने ।
दुश्मन भी देखे और यार भी देखे मैंने,
मतलब का संसार भी देखा मैंने ।।
रिश्ते बिखरते देखे पैसों के पीछे
आगे आगे लेखनी...

पत्थर के मैंने इंसान यहाँ पर देखे,
भले लोगों के गिरेबान यहाँ पर देखे ।
गरीबों की पक्की जुबान भी देखी मैंने,
रईसों के डिगते ईमान यहाँ पर देखे ।।
देखे ऊँची दुकानों पे पकवान फिके
आगे आगे लेखनी...
पैसों के कारण 'सावन' उठते जनाजे देखे,
बड़े बड़े महलों के छोटे दरवाजे देखे,
राजे महाराजे देखे भींख मांगते मैंने
चोरी के माल में दरोगा जी साझे देखे ।।
खाली हाथ जाते देखे सिकन्दर सरीखे
आगे आगे लेखनी...

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सावन चौहान कारौली -एक
कलमकार...
भिवाड़ी अलवर राजस्थान
मो.9636931534





Thursday, August 8, 2019

Naqaab rukh se


Naqaab rukh se

नकाब रुख से

काफ़िया- बिगाड़
रदीफ़- देती है

1212 1122 1212 22

नकाब रुख से वो जब भी, उघाड़ देती है।
बड़े बड़ों की शराफत, बिगाड़ देती है।।

कमाल हुश्न नवाजा है उसको मालिक ने
ईमान वालों की नीयत बिगाड़ देती है

रहे न दरमियां दूरी खुदा दिवानों के
जुदाई इश्क में हालत बिगाड़ देती है

रईसजादों के पहलू में होश में रहना
रईसजादों की आदत बिगाड़ देती है

गलत लोगों से करीबी नहीं होती अच्छी
सरीफजादों को सोहबत बिगाड़ देती है

शराब ठीक नहीं रोज भी पीना "सावन"
लगे जो लत तो ये इज्जत बिगाड़ देती है


सावन चौहान कारोली- गजलकार
भिवाड़ी अलवर राजस्थान

Monday, August 5, 2019

Ichchha shakti

   


     इच्छा शक्ति


सेना में दम था पहले भी
मगर कहाँ पर कमी रही

इच्छा शक्ति कुछ लोगों की
जाने कहाँ पर जमी रही

सत्ता के लोभी नेता थे
फकत मलाई खाते थे

सेना,सैनिक के साहस को
हर बारी ही गिराते थे

100 रुपये अनुदान मे से भी
90 खुद खा जाते थे

आज कोई आया दमदार तो
पड़ गए खाब खटाई में

सीधे सीधे रेड पड़ी थी
काली जमा कमाई में

Sunday, August 4, 2019

Ped lagao punya milega




पेड़ लगाओ पुन्य मिलेगा

पेड़ लगाओ पूण्य मिलेगा पेड़ धरा का है गहना
अंतिम एक उपाय यही है गर जीवित भी हैं रहना

काट रहे हो वृक्ष देव को आरी और कुल्हाड़ी से
क्यों तुम पहियें तोड़ रहे हो कुदरत की इस गाडी के
यूँ ही कटाई चलती रही तो बाढ़-अकाल पड़े सहना
अंतिम एक उपाय यही…
पेड़ लगाओ पूण्य...

जीवन भर देते ही है ये हमें फूल फल और मेवा
बदले में कभी कुछ ना मांगते ये ही तो हैं भोले देवा
कुदरत का वरदान वृक्ष है तोता से बोली मैना
अंतिम एक उपाय...
पेड़ लगाओ पूण्य…

जो देते हैं हमको जीवन उनका छीन रहे जीवन
कैसे बारिश होगी यहाँ पे धरा पे गर ना बचे ये वन
बिन हरियाली खुशहाली ना दादा दादी का कहना
अंतिम एक उपा…
पेड़ लगाओ पूण्य…

गर धरती से प्यार है हम को हम भी पेड़ लगाएँगे
हम भी लाल हैं इस धरती के सुंदर इसे बनाएंगे
आज से अपने मन मे सावन ये निश्चय तुम कर लेना
अंतिम एक उपाय…
पेड़ लगाओ पूण्य...

सावन चौहान कारौली -एक नादान कलमकार
भिवाड़ी अलवर राजस्थान
मो.9636931534

https://www.writersindia.in/2019/07/save-water-save-future.html

Friday, August 2, 2019

pardesh jo sawan gaye


Dil ki baton me

दिल कि बातों मे कभी ना आएंगे
अब किसी पे ना यकीं कर पाएंगे

तोड़ देगा जब कोई दिल आपका
याद फिर वो दिन पुराने आएँगे

हम जो' रोये इश्क मे अजि आपके
अश्क मेरे जलजला ले आएँगे

हर तरफ छाई है' कैसी तीरगी
एक पल ना बिन तेरे जी पाएँगे

तू रहे खुशहाल है दिल से दुआ
बद्दुआ भी तुझको ना दे पाएँगे

हो सके तो तुम भुला देना हमे
ख़ाब मे भी अब कभी ना आएंगे

जानता था जान लेलेगी ये' लत
दोष सारे उनके' सर ना ढाएँगे

छोड़ कर परदेश जो "सावन" गए
चैन से वो भी नही रह पाएँगे

सावन चौहान कारोली

Thursday, August 1, 2019

Singhon pe bhi padti bhari hai

"Singhon pe bhi padti bhari hai" 

HOLI SPECAIL

येsss गौरे -गौरे गालन  की
दो चार बरस लगे “प्यारी” है
सिंहों पे भी पड़ती भारी है

शादी को शिकंजो जो कस जावे
लेवो समझ शिकारी फंस जावे
गन्ना को सो जूस निकस जावे
भुगते ता उम्र लाचारी है
सिंहों पे भी पड़ती भारी है
खानो पिनों दुष्वार करें
ये रात दिना तकरार करें
बिन लड़े ना इन को चैन पड़े
लड़े जैसे सांड सरकारी हैं
सिंहों पे भी पड़ती भारी है

एक रात में बी ए करवादै
माँ बाप से पल में लड़वादे
भाई भाई में बिगड़ वादे
करे छाती पे बैठ संवारी है
सिंहों पे भी पड़ती भारी है

देखन में भोली गैया हैं
ये थानेदार की भी मैया हैं
कोई बिरचो हुओ ततैया हैं
चिक चिक की बड़ी बिमारी हैं
सिंहों पे भी पड़ती भारी है

नाय मनो इनकी तो मरनो
जो माने तो जिन्दो बरनो
आफत को बड़ो भारी झरनो
कोई दबी हुई चिंगारी हैं
सिंहों पे भी पड़ती भारी है

मूरख हैं जो इन्हें समझावै
नाय समझ की बात समझ आवै
नाय इन से पार कोई पावे
सब झूटी लम्बड़दारी है
सिंहों पे भी पड़ती भारी है

हम ने भी राड जगा दिनी
नारी की महिमा सुना दिनी
सावन साँची बतला दिनी
शायद  कम्बख्ती आरी हैं
सिंहों पे भी पड़ती भारी है

सावन चौहान कारौली -एक कलमकार
भिवाड़ी अलवर राजस्थान

मेरे हुजरे में कभी आओ अदब का चाँद रखता हूँ होशलों की दीवारें और छान रखता हूँ सेज मखमल की मुनासिब न हो शायद टूटी खटिया है मगर सम्मान ...