Saturday, July 6, 2019

hindi poem-antar man tak



hidi poem

अंतर मन तक~~~ को महकादे,
गीत,तराने,~~~~~~~ऐसे हो ।

परहित जीवन~~~~ भेंट चढ़ादे,
भगवे बाने,~~~~~~~~ऐसे हों ।

लिखने को तो ~~बहुत लिखा है,
दिल से लिखने ~~~~वालों नें ।

सुसुप्त व्यवस्था को जो जगा दे,
काव्य निशाने,~~~~~ ऐसे हों ।

लिखने के ही~~ ~संग संग बंधू,
बोली में भी ~~~~~~रस टपके ।

मन सागर में कँवल ***खिला दे,
शब्द सुहाने ~~~~*~~ऐसे हों ।

दो इंसानों में ~~~~~अंतर का,
मुझको गलत~~~#दस्तूर लगा ।

सबको देखे """""""एक नजर से,
हों पैमाने, ?????????ऐसे हों ।

सावन चौहान कारौली


No comments:

मेरे हुजरे में कभी आओ अदब का चाँद रखता हूँ होशलों की दीवारें और छान रखता हूँ सेज मखमल की मुनासिब न हो शायद टूटी खटिया है मगर सम्मान ...