Thursday, July 4, 2019

शायद वो नेता है




    माहिया छंद में एक कविता सर्जन

हाय कैसा ज़माना है
गिरवी रख कर इमां
बस पैसा कमाना है

बड़ा अजब तमासा है
इस कारीगर को खुद
उस बुत ने तरासा है

कैसा झांसा देता है ।
करे बात बहुत मीठी,
शायद वो नेता है ।

वो जो भींख माँगता है ।
स्वभाव अमीरों का,
सच में वो जानता है ।

ये कैसा आरक्षण है ।
सब खेल है वोटों का
मूल्यों का भक्षण है ।

माना शब काली है ।
दस्तक है उजालों की
सुबहा आने वाली है ।

"सावन चौहान कारौली" एक कलमकार
भिवाड़ी अलवर (राजस्थान)


मेरे हुजरे में कभी आओ अदब का चाँद रखता हूँ होशलों की दीवारें और छान रखता हूँ सेज मखमल की मुनासिब न हो शायद टूटी खटिया है मगर सम्मान ...