Monday, July 1, 2019

सुनहरी धुंध

एक कविता- सुनहरी धुंध


मालिक के किये हिस्से चार ।
कितना जालिम है संसार ।।

धर्म का मर्म ना जाने कोई ।
मानवता जाने कहाँ खोई ।।

स्वारथ  भेंट चढ़ी सच्चाई ।
कितनी बेबस है अच्छाई ।।

मंदिर मस्जिद बनी दुकान ।
पैसा बन बैठा भगवान् ।।

पापी मौज़ करे, फले फूले ।
और भलाई फंदे झूले ।।

राजनित की धुंद सुनहरी ।
वाह री जनता अंधी,बहरी ।

जात पात की गहरी खाई ।
जिसने दुनियां है बोराइ ।।

बेईमानी के सर पे ताज ।
ईमानदारी पड़ी नासाज ।।

अच्छों को मिलती हैं गाली ।
मक्कारों को मिलती ताली ।।

झूठ चाशनी लगे सुहानी ।
सत्य कहे मर जाए नानी ।।


सावन चौहान कारौली- एक कलमकार ...✍

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