Thursday, July 25, 2019

Jab se dil ashana ho gaya



212 212 212
Jab se dil ashana ho gaya


काफिया - आ (स्वर्)
रदीफ़ - हो गया

जब से दिल आशना हो गया
हर नजारा नया हो गया

जिसको खाबों में सोचा किये
वो मिरा हमनवा हो गया

जैसे नज़रों से नजरें मिली
चैन दिल का हवा हो गया  

हम शराबी से लगने लगे
जाने कैसा नशा हो गया  

उसने कितना छुपाया मगर
आँखों से सब बयां हो गया  

नींद आती नहीं रात भर
रोज का माजरा हो गया

रूह तक मेरी उतरा है यूँ
धड़कनों की सदा हो गया
“””””””””””””””””’”””””””’”””””
सावन चौहान कारोली
भिवाड़ी अलवर राजस्थान
उड़ान परिवार

https://www.writersindia.in/2019/06/blog-post_9.html?m=1

No comments:

मेरे हुजरे में कभी आओ अदब का चाँद रखता हूँ होशलों की दीवारें और छान रखता हूँ सेज मखमल की मुनासिब न हो शायद टूटी खटिया है मगर सम्मान ...