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गुब्बारा

"गुब्बारा"



'गुब्बारा' बच्चों को बहुत """प्रिय"'"'होता है । रंग बिरंगे लाल हरे काले,पीले,नारंगी बैंगनी,फिरोजी~~ जाने कैसे कैसे रंग के, जैसे किसी उपवन में मनभावन पुष्प सहसा ही सब का ध्यान आकृषित कर लेते है । वैसे ही गुब्बारे
भी सब का ध्यान आकृषित करने में
सक्षम होते है । किसी भी शुभ
अवसर पर फूलों की भाँति
इन्हें भी सजाया
जाता## है
और ये उस
महफ़िल की भव्यता
को और बढ़ा चढ़ा देते है
सकारात्मकता के प्रतीक और
@@खुशहाली और शुभ अवसर
को दर्शाते रोमांचित कर देने वाले
ये गुब्बारें । कक्ष को वटिका की तरह
सुशोभित कर देते है । हर मन को भाने
वाले बच्चों को लुभाने वाले प्यारे प्यारे गुब्बारे
कोई छोटा गुब्बारा कोई बड़ा गुब्बारा कोई ककड़ी का आकार लिए कोई दिल का
आकार लिए, कोई 'फूल' तो कोई
सितारा कोई मछली की आकृति का
कोई गुड्डे जैसा कोई गुड़िया जैसा रोते हुए
बच्चों की मुष्कान लौटा देने वाले ये गुब्बारे लेकिन ये जब तक इनमे "हवा" न भर दी
जाए ये “फूलते” नहीं है या ये कहे
गुब्बा नहीं होते, जैसे ही इनमे
'हवा' भर दी जाती है फिर ये जमीन
पर कम और “ऊपर” ही ऊपर ज्यादा उड़ते है
और जमीन पर अगर रह भी जाए तो इनके
पैर नहीं होते तो ये इधर उधर लुढ़कते
डोलते है और जैसे ही सच्चाई की कठोर
घास के तुनके से स्पर्श होते ही
इनकी हवा निकल जाती है
यूहीं गुब्बारे की तरह
ही कुछ व्यक्ति होते
है  अगर उनमे
कोई थोड़ी
'हवा'
भर दे
तो 'वो' वो
भी इन गुब्बारों
की भाँति ही फूल
कर गुब्बा’रा’  कुप्पा हो
जाते है लेकिन ऐसे
लोगों का भी कोई स्टैंड
या यूँ कहे पैर नहीं ~होते
और लगभग इनका भी वैसा
ही ~“अंजाम”~ होता है
इस लिए गुब्बारे देखने
भर तक तो ठीक है
लेकिन #गुब्बारा
हो जाना
ठीक
नहीं
“”””’’’’’’’’’”’’’’’“सावन चौहान कारोली””””’’’’’’’’’’’””’’

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कविता - किसका गुमान करे

कविता- किसका गुमान करे
किसका ‘गुमान’ करे , काहे ‘अभिमान’ करे । ‘पैसा और सत्ता’ बंधू , आनी जानी चीज है ।
पैसा ना जो कर पाये , काम वो ये कर लाए । ‘मुश्कान छोटी’ बड़े , काम की चीज़ है ।
‘सत्य’ का ‘व्यवहार’ कर, बातें तु विचार कर । ‘अच्छाई बुराई’ साथ , जाने वाली चीज है ।
‘आचरण’ को साफ रख, मन में ना ‘पाप’ रख । ‘माफ करना’ बड़ा , बनाने वाली चीज़ है ।
‘संस्कार’ छोड़ मत, रस्मों को तोड़ मत । ‘रीति और रिवाज’ भी, ‘निभाने’ वाली चीज हैं ।
‘गाँठ’ मन की खोल ले, बोल ‘मीठे’ बोल ले । ‘झगड़ा  लड़ाई’ तो, ‘मिटाने’ वाली चीज़ हैं ।
‘नेक काम’ कर ले , उसको सुमरले । ‘वक़्त’ लोट कर नहीं , आने वाली चीज़ है ।
थोडा सा ‘नरम’ बन, छोड़ दे ‘क्रोध अगन’ । ‘सब्र’ भी तो सावन, ‘आजमाने’ वाली चीज़ है ।
कवि- “सावन चौहान कारौली” भिवाड़ी अलवर राजस्थान मो.9636931534



Ichchha shakti

इच्छा शक्ति


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मगर कहाँ पर कमी रही
इच्छा शक्ति कुछ लोगों की
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फकत मलाई खाते थे
सेना,सैनिक के साहस को
हर बारी ही गिराते थे
100 रुपये अनुदान मे से भी
90 खुद खा जाते थे
आज कोई आया दमदार तो
पड़ गए खाब खटाई में
सीधे सीधे रेड पड़ी थी
काली जमा कमाई में
सावन चौहान करोली

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