Saturday, June 22, 2019

यादों के काफिले



  यादों के काफिले

2122 2122 2122

जिसको चाहा है, गए उनसे छले हैंं
गर्दिशों की गौद में, हम तो पले हैं

रात भर जलता रहा बनके चरागा
जुगनुओं को नाज है की,हम जले हैं

सो गई दुनियाँ न नींदाई हमे ही
हम कमर के साथ सारी शब, ढले हैं

आग का दिल मोम जैसा है नरम सा
शबनमों के दिल् में भी, कुछ जलजले हैं

यूँ तो मेरे रूबरू रहता है जालिम
दरमियाँ लेकिन दिलों के, फासलें हैं

आरजू है आज भी सूरज को चूमूं
क्या हुआ जो इश्क में ये, पर जले हैं

तू गया जब से मैं तन्हा हूँ बहुत ही
साथ तेरी यादों के बस, काफ़िले हैं

बरसा होगा टूट के शब भर वो सावन
इस लिए रुख़्सार ये लगते धुले हैं

सावन चौहान कारोली
भिवाड़ी अलवर राजस्थान
23-04-2019

No comments:

मेरे हुजरे में कभी आओ अदब का चाँद रखता हूँ होशलों की दीवारें और छान रखता हूँ सेज मखमल की मुनासिब न हो शायद टूटी खटिया है मगर सम्मान ...