Sunday, June 23, 2019

कोई हिन्दू कोई मुस्लिम

कोई हिन्दू कोई मुस्लिम

                                               

कोई हिन्दू कोई मुस्लिम,
मगर इन्सां नदारद है ।

       मजहब की आड में सावन,
        फक्त होती सियासत है ।।

मेरे शरबत में विष दिखता है,
है अमृत जहर भी उनका ।

      तरफदारी रकीबों की,
      मेरे अपनों की फितरत है ।।

हम ने सीने से लगाया,
उसने खंज़र था छुपाया ।

      वो कायरता समझता है,
      हमारी जो शराफत है ।।

गुनहा से प्यार करते हैं,
वो छुपके वार करते हैं ।

       तरक्की देख जलते हैं,
      उनके बसकी ना मेहनत है ।।


Sawan chauhan karoli

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