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HARIYANA

इसा हरियाणा स


एक बिटिया की फ़रमाईश पर आज किया एक नया सृजन हरियाणवी संस्कृति पर विशेष:-

तर्ज- गाडी आले मनै बैठाले  

दूध दही की नदियाँ बहती लहलाहते खलिहान
इसा हरियाणा स
धरती माँ के पूत लाडले,   उपजाते अन्न धान
इसा हरियाणा स

आम नीम पे झूला झूलें जब सामण रुत आवै स
तीज सिंजारे कट्ठी होकै, मेघ मल्हार ये  गावैं स
रंगे बिरंगे दामण पहरैं,   स फेमस परिधान
इसा हरियाणा स

ठाडी बोली मन के सीधे एकदम सीधी बात करैंं
लख्मीचंद की चलै रागनी, रजगा सारी रात करै
मेहर सिंह और मांगे राम हुए सांगी घने सुजान
इसा हरियाणा स
मातृभूमि की सेवा खातेर सबते पहलम तैयार रहवैं
करैं चौकसी सरहद ऊपर जो खाण्डे की धार रहवैं
दुश्मन की छाती कांप्यां करै,  देख के सिंह सी श्यान
इसा हरियाणा स

खेल कूद में रहते आगे, सोने की  बरसात करैं
कुस्ती और कबड्डी खेलैं, दंगल दो दो हाँथ करैं
बॉक्सर हुए बिजेन्दर बरगे जाणें सकल जहान
इसा हरियाणा स

ईश्वर में भरपूर आस्था,  करते टहल बुजुर्गो की
गाँव के भोले भाले माणश राखै कद्र तजुर्बों की
इनकी सेवा भाव का कायल, ये *सावन चैहान
इसा हरियाणा स

"सावन चौहान कारोली " - एक साधक
भिवाड़ी अलवर राजस्थान
14-09-2017


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कविता - किसका गुमान करे

कविता- किसका गुमान करे
किसका ‘गुमान’ करे , काहे ‘अभिमान’ करे । ‘पैसा और सत्ता’ बंधू , आनी जानी चीज है ।
पैसा ना जो कर पाये , काम वो ये कर लाए । ‘मुश्कान छोटी’ बड़े , काम की चीज़ है ।
‘सत्य’ का ‘व्यवहार’ कर, बातें तु विचार कर । ‘अच्छाई बुराई’ साथ , जाने वाली चीज है ।
‘आचरण’ को साफ रख, मन में ना ‘पाप’ रख । ‘माफ करना’ बड़ा , बनाने वाली चीज़ है ।
‘संस्कार’ छोड़ मत, रस्मों को तोड़ मत । ‘रीति और रिवाज’ भी, ‘निभाने’ वाली चीज हैं ।
‘गाँठ’ मन की खोल ले, बोल ‘मीठे’ बोल ले । ‘झगड़ा  लड़ाई’ तो, ‘मिटाने’ वाली चीज़ हैं ।
‘नेक काम’ कर ले , उसको सुमरले । ‘वक़्त’ लोट कर नहीं , आने वाली चीज़ है ।
थोडा सा ‘नरम’ बन, छोड़ दे ‘क्रोध अगन’ । ‘सब्र’ भी तो सावन, ‘आजमाने’ वाली चीज़ है ।
कवि- “सावन चौहान कारौली” भिवाड़ी अलवर राजस्थान मो.9636931534



Ichchha shakti

इच्छा शक्ति


सेना में दम था पहले भी
मगर कहाँ पर कमी रही
इच्छा शक्ति कुछ लोगों की
जाने कहाँ पर जमी रही
सत्ता के लोभी नेता थे
फकत मलाई खाते थे
सेना,सैनिक के साहस को
हर बारी ही गिराते थे
100 रुपये अनुदान मे से भी
90 खुद खा जाते थे
आज कोई आया दमदार तो
पड़ गए खाब खटाई में
सीधे सीधे रेड पड़ी थी
काली जमा कमाई में
सावन चौहान करोली

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भूरा बैल

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उपर के खर्चे थे और भी, मात पिता ने था पाला । बीमारी और शादी ब्याह में, सिर्फ सहारा था लाला । सावन वो दिन भी देखा जब, बैल हमारा हारा था ।। एक बैल की जोड़ी …
छोटा सा धरती का टुकड़ा, जो बस मात्र सहारा था ।।
“सावन चौहान कारोली“ एक कलमकार अ0 भा0 सा0परिषद भिवाड़ी अलवर राजस्थान मो.9636931534

https://www.writersindia.in/2019/07/chashka-bura-sharab-ka.html